June 18, 2026 12:32 pm

राजनीति से बौद्धिक वर्ग की दूरी राष्ट्र के प्रति मौन अपराध – अशोक विश्वकर्मा

अशोक विश्वकर्मा ने कहा कि राजनीति से बौद्धिक वर्ग की दूरी राष्ट्र के प्रति मौन अपराध है। पढ़े-लिखे लोगों की राजनीतिक उदासीनता तटस्थता नहीं, राष्ट्र के प्रति मौन अपराध है। व्यवस्था को बाहर बैठकर कोसा जा सकता है, लेकिन बदला केवल भीतर रहकर ही जा सकता है। अशोक विश्वकर्मा का मानना है कि राजनीति को शुद्ध करने के लिए शिक्षित और चरित्रवान लोगों का इसमें आना जरूरी है।

वाराणसी: ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि मौजूदा समय की राजनीति गंभीर संक्रमण के दौर से गुजर रही है। उन्होंने कहा कि 40 के दशक की राजनीति में देश को उच्च कोटि का बौद्धिक नेतृत्व दिशा दे रहा था। यदि वर्ष 1947 के भारत का विश्लेषण करें, तो उस समय देश की साक्षरता दर मात्र 12% से 18% के बीच थी। देश की बहुसंख्यक आबादी निरक्षरता, घोर गरीबी और सामाजिक कूपमंडूकता से जूझ रही थी। इसके बावजूद, उस दौर का राजनीतिक नेतृत्व बौद्धिक रूप से इतिहास के सबसे समृद्ध दौर में था।
महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. बी.आर. अंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल और मौलाना आजाद जैसे दिग्गज देश की नियति तय कर रहे थे। ये वे लोग थे जिन्होंने ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की थी। त्याग और वैचारिक निष्ठा उस समय के नेताओं के लिए राजनीति, आजीविका या अकूत संपत्ति अर्जित करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का उद्देश्य था। तत्कालीन संसद और विधानसभाओं में होने वाले वाद-विवाद तर्कों, आंकड़ों, वैश्विक दर्शन और दूरदर्शिता पर आधारित होते थे।
आज 21वीं सदी के तीसरे दशक में भारत की साक्षरता दर अपने उच्चतम स्तर पर है। देश के अधिकांश घरों में साक्षर या कम से कम एक स्नातक या उच्च शिक्षित व्यक्ति मिल जाएगा। तकनीकी, प्रबंधकीय और वैज्ञानिक मोर्चों पर भारतीयों का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है। परंतु, इस शैक्षणिक प्रगति के समानांतर देश के राजनीतिक स्तर में भारी गिरावट आई है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और विभिन्न नागरिक संगठनों के आंकड़े दर्शाते हैं कि देश के नीति-निर्माताओं में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले, घोटालों में लिप्त और बाहुबलियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे समाज शिक्षित होता गया, राजनीति में बौद्धिकता और शुचिता का स्थान धनबल और बाहुबल ने ले लिया।
स्वतंत्रता के बाद के दशकों में पढ़े-लिखे वर्ग ने कॉर्पोरेट नौकरियों, प्रशासनिक सेवाओं और विदेश पलायन को तो प्रतिष्ठा का प्रतीक माना, लेकिन सक्रिय राजनीति या नीति-निर्माण की प्रक्रिया को अछूत घोषित कर दिया।
एक शीर्ष वैज्ञानिक, डॉक्टर, प्रोफेसर या आईएएस अधिकारी वर्षों की कठिन तपस्या और योग्यता के बल पर शीर्ष पर पहुंचता है, लेकिन अंततः उसे उन नेताओं के आदेशों और नीतियों के आगे झुकना पड़ता है जिनकी शैक्षणिक योग्यता संदिग्ध होती है और जिन पर संगीन आपराधिक मामले दर्ज होते हैं।
जब अनपढ़ या आपराधिक प्रवृत्ति के लोग नीति-निर्माता बनते हैं, तो वे शिक्षा, शोध और दूरगामी विकास की नीतियां बनाने में असमर्थ होते हैं। लोक-लुभावन दांव, जातिगत समीकरण और संकीर्ण एजेंडे पर काम करते हैं। इसका सीधा नुकसान देश के ईमानदार करदाता और शिक्षित वर्ग को उठाना पड़ता है, जिससे समाज में एक गहरी निराशा और हताशा जन्म लेती है। समाज में डिग्रियों का बढ़ जाना तब तक निरर्थक है जब तक वह शिक्षा नागरिक चेतना और राजनीतिक जिम्मेदारी में न बदले। पढ़े-लिखे लोगों की राजनीतिक उदासीनता कोई तटस्थता नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति एक मौन अपराध है।
यदि बुद्धिजीवी वर्ग अपनी वातानुकूलित चर्चाओं से बाहर निकलकर राजनीति के कीचड़ को साफ करने की जिम्मेदारी नहीं उठाएगा, तो उसे इसी प्रकार अयोग्य शासकों की नीतियां मानने और उनकी ‘आधुनिक गुलामी’ करने को विवश होना पड़ेगा। राजनीति को शुद्ध करने का एकमात्र तरीका यही है कि शिक्षित और चरित्रवान लोग इसमें प्रवेश करें, क्योंकि व्यवस्था को बाहर बैठकर कोसा जा सकता है, लेकिन केवल भीतर रहकर ही बदला जा सकता है।

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