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ऋग्वेद के प्रमाण के साथ महासभा का बड़ा ऐलान! 17 सितंबर ही है ‘सृष्टि दिवस’, राजकीय अवकाश के लिए आर-पार की लड़ाई

 

भगवान विश्वकर्मा हैं ‘जगत के प्रथम इंजीनियर’, अशोक विश्वकर्मा ने उठाई 17 सितंबर को सरकारी छुट्टी घोषित करने की मांग।

​वाराणसी: 17 सितंबर को मनाया जाने वाला भगवान विश्वकर्मा पूजा पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार संपूर्ण धरती का निर्माण दिवस यानी ‘पृथ्वी सृष्टि दिवस’ है। इस ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व को देखते हुए ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा ने 17 सितंबर को ‘राष्ट्रीय शिल्प दिवस’ घोषित करने और इस दिन राजकीय अवकाश की मांग को लेकर अपना संकल्प और तेज कर दिया है।

​भगवान विश्वकर्मा: ब्रह्मांड के प्रथम इंजीनियर…
​महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने शास्त्रीय प्रमाणों का हवाला देते हुए बताया कि जिस प्रकार ब्रह्मा जी ने ब्रह्मांड की रचना की, उसी प्रकार भगवान विश्वकर्मा ने पृथ्वी को मनुष्य के रहने योग्य स्वरूप प्रदान किया। पर्वत, नदियाँ, नगर, भवन, प्राचीन यंत्र और स्थापत्य कला—सब कुछ भगवान विश्वकर्मा की ही देन है। इसीलिए कन्या संक्रांति (17 सितंबर) का दिन वास्तव में पूरी धरती के सृजन का उत्सव है।

​ऋग्वेद में भी निहित है भगवान विश्वकर्मा की महिमा…
​वैदिक ग्रन्थों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि ऋग्वेद के 10वें मंडल के ‘विश्वकर्मा सूक्त’ में स्पष्ट कहा गया है:
​“विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक”
​अर्थात: भगवान विश्वकर्मा ही संपूर्ण जगत को धारण करने वाले और इसका निर्माण करने वाले हैं। प्राचीन ऋषियों-मुनियों ने भी उन्हें इस संसार का पहला ‘इंजीनियर’ और वास्तुकार माना है, जिन्होंने ब्रह्मा जी की मानसिक सृष्टि को भौतिक व मूर्त रूप दिया।

​राजकीय अवकाश की मांग क्यों???
​अशोक विश्वकर्मा ने जोर देकर कहा कि जब 17 सितंबर का दिन संपूर्ण विश्व के निर्माण का दिन है, तो इसे राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलना ही चाहिए। महासभा और विभिन्न संगठन पिछले कई वर्षों से लगातार सरकार से यह मांग कर रहे हैं कि देश के करोड़ों शिल्पकारों, कारीगरों और श्रमिकों के सम्मान में इस दिन को आधिकारिक तौर पर ‘राष्ट्रीय शिल्प दिवस’ के रूप में दर्ज कर राजकीय अवकाश घोषित किया जाए।
​महासभा अध्यक्ष ने दोहराया कि जब तक 17 सितंबर को राजकीय अवकाश का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक उनका यह सामाजिक और सांस्कृतिक अभियान पूरे संकल्प के साथ जारी रहेगा।

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