वाराणसी: अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग विभाग के प्रदेश उपाध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने केंद्र व राज्य सरकार की नीतियों और बढ़ती महंगाई को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार की नीतियों और मंत्रियों के भ्रष्टाचार के चलते चीनी की मिठास फीकी पड़ गई है। आगामी त्यौहारी सीजन से ठीक पहले रोजमर्रा की चीजों के बढ़ते दामों ने आम जनमानस की चिंता को कई गुना बढ़ा दिया है।
पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) बनी चीनी संकट की वजह…
कांग्रेस नेता अशोक विश्वकर्मा ने कहा कि सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल (E20) ब्लेंडिंग को जबरन और अनिवार्य रूप से लागू करने के लिए बड़े पैमाने पर गन्ने और अनाज का इस्तेमाल किया है। इस नीति के चलते देश में चीनी के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई और बाजार में चीनी की कमी पैदा हो गई। परिणामस्वरूप, चीनी की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल आया है और इसके दाम बढ़कर 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। भाजपा की गलत नीतियों ने आम आदमी की चाय और त्यौहारों की मिठाई से मिठास छीन ली है।
महज 20 दिनों में 20 रुपये महंगी हुई चीनी, खुदरा दामों में 53% का उछाल…
बाजार के आंकड़ों का हवाला देते हुए विश्वकर्मा ने बताया कि महज 20 दिनों के भीतर चीनी के दाम में 20 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई है। यदि पिछले एक साल के खुदरा मूल्यों की तुलना की जाए, तो चीनी की कीमतों में लगभग 53% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। E20 पॉलिसी को अनिवार्य करने के फैसले ने सीधे तौर पर मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों के घरेलू बजट को बिगाड़ कर रख दिया है।
निर्यात करने वाला भारत अब चीनी आयात करने पर मजबूर…
गंभीर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जो भारत कल तक विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश हुआ करता था, आज वही देश चीनी की कमी से जूझ रहा है। E20 पॉलिसी के कारण लगभग 25 लाख टन चीनी के उत्पादन के बराबर का गन्ना इथेनॉल बनाने में खप गया। इस संकट से निपटने के लिए सरकार को अब 10 लाख टन चीनी आयात करने का फैसला लेना पड़ा है। जो देश दुनिया को चीनी बांटता था, उसे आज अपनी जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर होना पड़ रहा है, जो सरकार की नाकामी का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
दूध और अन्य खाद्य पदार्थों पर भी दिखा महंगाई का असर…
कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा कि महंगाई का यह असर सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं है। चीनी और चारे की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण दूध जैसी अति-आवश्यक वस्तु के दाम भी 5 से 10 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के बीच कोई आपसी सामंजस्य नहीं है, जिसकी वजह से रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं की कीमतें बेकाबू हो रही हैं।
किसानों को नहीं मिला बढ़ती मांग का फायदा…
विश्वकर्मा ने कहा कि सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि बाजार में गन्ने की भारी मांग के बावजूद इसका कोई आर्थिक लाभ हमारे किसान भाइयों को नहीं मिल पा रहा है। मुनाफा केवल चुनिंदा उद्योगपतियों की जेब में जा रहा है, जबकि किसान और उपभोक्ता दोनों पिस रहे हैं।








