February 6, 2026 6:44 am

यूजीसी एक्ट का विरोध अनुचित, सामाजिक न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों पर हमला- अशोक विश्वकर्मा

यूजीसी एक्ट 2026 का स्वागत करते हुए ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने इसे समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में न्यायोचित पहल बताया है। उन्होंने कहा कि इस एक्ट का विरोध समानता के अवसर और सामाजिक न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों पर हमला है, यूजीसी एक्ट पीड़ित वर्ग के घाव पर मरहम के समान है।

वाराणसी: ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने एक विज्ञप्ति में यूजीसी एक्ट 2026 का स्वागत करते हुए इसे समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में न्यायोचित पहल बताया है। उन्होंने कहा कि यूजीसी एक्ट का विरोध कुछ मुट्ठी भर वर्चस्ववादी ताकतो द्वारा किया जा रहा है जो समानता और सामाजिक न्याय के विरोधी हैं। यूजीसी एक्ट पीड़ित वर्ग के घाव पर मरहम के समान है.
उन्होंने कहा यूजीसी एक्ट का विरोध समानता के अवसर और सामाजिक न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों पर सीधा हमला है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026 जारी किए हैं। जिसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वंचित और उत्पीड़ित समूहों की शिकायतों के निवारण और सहायता के लिए एक सुव्यवस्थित ढांचा तैयार करना है। बताया जाता है कि यह याचिका रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने बताया कि यूजीसी के नए नियमों के अनुसार, प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को एक समान अवसर केंद्र स्थापित करना होगा और उसे नागरिक समाज समूहों, जिला प्रशासन, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों, स्थानीय मीडिया और पुलिस के साथ समन्वय स्थापित करना है। यह केंद्र कानूनी सहायता की सुविधा प्रदान करने के लिए जिला और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के साथ समन्वय स्थापित करेगा। अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है। इसी बात का विरोध हो रहा है। जबकि यह व्यवस्था समानता के अवसर और सामाजिक न्याय के दृष्टिगत न्यायोचित है जिससे पिछड़ा समाज में इस बिल को लेकर खुशी है। उन्होंने बताया कि यूजीसी के नए नियमों के तहत, यह केंद्र समानता से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन, वंचित समूहों को शैक्षणिक और वित्तीय मार्गदर्शन प्रदान करने अधिकारियों और नागरिक समाज के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए जिम्मेदार होगा। इस बिल के आने से पिछड़ी जातियों के छात्र, कर्मचारी और टीचर भी अपने साथ होने होने वाले भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायत समान अवसर केंद्र में कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 5 सालों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118 फीसदी बढ़ीं है। ओबीसी को विश्वविद्यालयों में नामांकन में 1990 से तथा फैकल्टी भर्ती में 2010 से आरक्षण दिया गया। इसके बावजूद वंचित वर्गों की भागीदारी अब भी 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकी है। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 लागू होने के 36 साल बाद भी दलित उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यूजीसी की ओर से संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में पिछले पांच सालों में 118.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019-20 में जहां 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं। वर्ष 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई। वर्ष 2019-20 से वर्ष 2023-24 के बीच 704 विश्वविद्यालयों और 1553 कॉलेजों से कुल 1160 शिकायतें यूजीसी को मिली।

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