द्वापर युग के उस घनघोर अंधकार को चीरकर जब मध्यरात्रि में कारागार की सलाखें स्वयं पिघल गईं और उफनती यमुना ने अपने प्रवाह को समेट लिया, तब धरती पर केवल एक बालक का जन्म नहीं हुआ था—बल्कि अधर्म, अत्याचार और तानाशाही के पतन का शंखनाद हुआ था। भगवान श्री हरि विष्णु के आठवें पूर्ण अवतार श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध धर्म की विजय का सर्वकालिक संदेश है।
मथुरा का अत्याचारी राजा कंस, जिसने सत्ता के मद में अपने ही पिता उग्रसेन को बंदी बनाया और बहन देवकी पर अमानवीय अत्याचार ढाए, वह पाप के चरम का प्रतीक था। आकाशवाणी के भय से उसने नवजात शिशुओं की नृशंस हत्याएं कीं, लेकिन सत्य और धर्म की रक्षा के विधान को कोई टाल न सका। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में जब बालकृष्ण ने जन्म लिया, तो चमत्कार केवल कारागार के ताले टूटने भर का नहीं था; वह संदेश था कि जब अत्याचार अपनी सीमाएं लांघता है, तब काल स्वयं अवतार लेकर उसका अंत करता है।
वासुदेव जी द्वारा उफनती यमुना पार कर बाल-गोपाल को गोकुल पहुँचाना और बदले में योगमाया को मथुरा लाना, इस बात का प्रमाण है कि धर्म की स्थापना के लिए विषम से विषम परिस्थितियों में भी निर्भीक होकर कर्तव्य पथ पर बढ़ना होता है। श्रीकृष्ण ने अपने पूरे जीवन में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और सामाजिक विषमताओं को समाप्त किया। सुदामा के साथ उनकी निश्छल मित्रता से लेकर कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से दिया गया ‘कर्मयोग’ का ज्ञान—मानवता के लिए आज भी सबसे बड़ा मार्गदर्शक है।
महाराष्ट्र की जीवंत ‘दही-हांडी’ की परंपरा हो, गोकुलाष्टमी का आनंद हो या नंद बाबा के आंगन में गूंजता ‘नंदोत्सव’—श्रीकृष्ण की बाल-लीलाएं समाज को प्रेम, समरसता और भ्रातृत्व की डोर में पिरोती हैं।
आज के परिप्रेक्ष्य में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम समाज में व्याप्त अन्याय, शोषण और अधर्म के विरुद्ध एकजुट होकर खड़े हों। जब-जब अधर्म सिर उठाएगा, श्रीकृष्ण का विचार और उनका दिखाया कर्ममार्ग ही समाज को प्रकाश की ओर ले जाएगा।








