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दलितों और पिछड़ों के मसीहा डॉ अंबेडकर का जीवन समावेशी भारत के लिए समर्पित था- अशोक विश्वकर्मा

डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन समावेशी भारत के लिए समर्पित था। उन्होंने संविधान के माध्यम से समानता, स्वतंत्रता और अस्पृश्यता उन्मूलन सुनिश्चित की। शिक्षा और संगठित संघर्ष से दलितों को उनका हक दिलाया। अशोक विश्वकर्मा ने उनकी जयंती पर उन्हें नमन किया और भावपूर्ण श्रद्धांसुमन अर्पित की।

वाराणसी: ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने जयंती पर बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को नमन करते हुए भावपूर्ण श्रद्धांसुमन अर्पित की। उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर आधुनिक भारत के निर्माता, संविधान के जनक और पिछड़ों/दलितों के सबसे बड़े मसीहा थे। उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से समानता, स्वतंत्रता और अस्पृश्यता उन्मूलन सुनिश्चित की, तथा शिक्षा और संगठित संघर्ष से दलितों को उनका हक दिलाया। उन्होंने संविधान में अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत को पूरी तरह से समाप्त कर उसे एक कानूनी अपराध बना दिया। दलितों को समानता का दर्जा दिलाने के लिए सामाजिक भेदभाव और अछूत प्रथा के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी। महाड़ सत्याग्रह के माध्यम से सार्वजनिक जलस्रोतों पर दलितों के अधिकार की वकालत की उनका मानना था कि शिक्षा ही मुक्ति का मार्ग है। उन्होंने दलित छात्रों के लिए हॉस्टल और छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की और 1945 में ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना की। उन्होंने महिलाओं को संपत्ति और शिक्षा में समान अधिकार दिलाने के लिए भी काम किया। उन्होंने पिछड़ों की पहचान करने और उनके उत्थान के लिए संविधान में धारा 340 का प्रावधान किया। वह स्वतंत्र भारत के पहले विधि और न्याय मंत्री थे। जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए ‘हिंदू कोड बिल’ पेश किया। उनकी पुस्तक ‘द प्रॉब्लम ऑफ द रूपी’ पर आधारित आरबीआई (RBI) की स्थापना में अहम भूमिका रही। उन्होंने संविधान में समानता का अधिकार और अस्पृश्यता आंदोलन के द्वारा ऐतिहासिक अन्याय को दूर किया। जातिगत भेदभाव से दुखी होकर, उन्होंने 1956 में लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया, जो समानता की ओर एक साहसिक कदम था। डॉ. भीमराव अंबेडकर का संपूर्ण जीवन सामाजिक न्याय, बंधुत्व और एक समावेशी भारत के निर्माण के लिए समर्पित था।

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